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Bihar Crime News: CID का DSP बन नौकरी दिलाने का झांसा, दर्जनों लोगों से लाखों की ठगी का आरोप; बिहार पुलिस का दारोगा फरार

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Alam Ki Khabar | Bihar News | Patna News | Samastipur News | भागलपुर में खुद को CID का DSP बताकर नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी करने का आरोप, बिहार पुलिस में कार्यरत मनोज वर्मा फरार, पुलिस छापेमारी में जुटी।

भागलपुर, 20 अगस्त।भागलपुर में सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर कथित ठगी का एक मामला पुलिस महकमे के लिए भी सवाल खड़े कर रहा है। आरोप है कि बिहार पुलिस में कार्यरत मनोज वर्मा ने खुद को CID का DSP बताकर दर्जनों लोगों को सरकारी विभागों में नौकरी लगवाने और अधिकारियों से पैरवी कराने का भरोसा दिया। इसी दावे के आधार पर उसने कई महिलाओं और पुरुषों से लाखों रुपये लिए। मामला थाने तक पहुंचने के बाद आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है और उसकी गिरफ्तारी के लिए भागलपुर से लेकर पटना तक छापेमारी की जा रही है।

मामले में कैंसर से पीड़ित महिला सोनम भारती समेत दो महिलाओं की ओर से भागलपुर के इशाकचक और बाईपास थाने में शिकायत दर्ज कराई गई है। आरोप है कि नौकरी और सरकारी विभागों में काम दिलाने का भरोसा देकर उनसे रकम ली गई। पुलिस अब शिकायतों के आधार पर पूरे नेटवर्क और पैसों के लेन-देन की जानकारी जुटाने में लगी है।

खुद को बताया CID का DSP

पुलिस जांच में सामने आया है कि मनोज वर्मा कथित तौर पर लोगों के सामने अपनी पहचान CID के DSP के रूप में पेश करता था। इसी पद और प्रभाव का इस्तेमाल कर वह लोगों को भरोसा दिलाता था कि सरकारी विभागों में उसकी ऊंची पहुंच है और वह नौकरी या किसी अन्य काम के लिए अधिकारियों से पैरवी करा सकता है।

आरोप है कि कृषि कॉलेज, NTPC और पुलिस विभाग में नौकरी या काम दिलाने की बात कहकर लोगों को अपने प्रभाव में लिया गया। नौकरी की उम्मीद में कई लोगों ने आरोपी को पैसे दिए। पुलिस के सामने अब यह पता लगाने की चुनौती है कि कुल कितने लोगों से रकम ली गई और कितनी राशि का लेन-देन हुआ।

पुलिस ने जांच में क्या पाया?

भागलपुर के वरीय पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार यादव के अनुसार, मामले में पहले बांका थाने में जीरो FIR दर्ज हुई थी। बाद में उसे इशाकचक थाना भेजा गया। इसके अलावा बाईपास थाने में भी एक अलग मामला दर्ज किया गया है।

एसएसपी के मुताबिक पुलिस ने आरोपी की पहचान और पद को लेकर सत्यापन कराया है। जांच में यह बात सामने आई कि मनोज वर्मा DSP नहीं है। स्पेशल ब्रांच से सत्यापन के बाद पुलिस को उसके बिहार पुलिस में कार्यरत होने की जानकारी मिली है। वह पटना में पुलिस के एक विभाग से जुड़ा बताया गया है और वहां डाक पहुंचाने का काम करता है।

यानी जिस पद का कथित तौर पर इस्तेमाल कर लोगों के बीच प्रभाव बनाया गया, पुलिस के अनुसार आरोपी उस पद पर है ही नहीं। यही बिंदु इस पूरे मामले की जांच में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भागलपुर और पटना में तलाश

मामला दर्ज होने के बाद पुलिस ने आरोपी की गिरफ्तारी के लिए कई ठिकानों पर दबिश दी। पुलिस के अनुसार पटना स्थित उसके ठिकाने से भी वह फरार मिला। भागलपुर में उसके घर पर भी छापेमारी की गई, लेकिन वहां भी आरोपी पुलिस के पहुंचने से पहले निकल चुका था।

छापेमारी के दौरान घर से हथियार बरामद होने की बात भी सामने आई है। पुलिस के मुताबिक हथियार लाइसेंसी बताया गया है। अब संबंधित लाइसेंस को रद्द कराने की कार्रवाई भी की जा रही है।

पुलिस का कहना है कि आरोपी की गिरफ्तारी के साथ ही ठगी से जुड़े अन्य पहलुओं का भी खुलासा हो सकेगा। खास तौर पर यह जांच की जा रही है कि उसने किन-किन लोगों से संपर्क किया, किस विभाग में नौकरी दिलाने का दावा किया और रकम किस माध्यम से ली गई।

कुछ लोगों का पैसा लौटाने का भी आरोप

मामले का एक और पहलू जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण है। शिकायत दर्ज होने के बाद कुछ पीड़ितों को कथित तौर पर उनकी रकम वापस किए जाने की बात सामने आई है। हालांकि इससे मामला खत्म नहीं होता, क्योंकि कई लोगों ने ठगी का आरोप लगाते हुए पुलिस से शिकायत की है।

पुलिस अब यह भी पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि रकम वापस करने की वजह क्या थी और किन लोगों को पैसा लौटाया गया। इससे आरोपी के खिलाफ सामने आए आरोपों और कथित लेन-देन की कड़ियों को जोड़ने में मदद मिल सकती है।

कैंसर पीड़ित महिला से भी रकम लेने का आरोप

पीड़ित महिलाओं की ओर से मुकदमा लड़ रहे वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव कुमार सिंह ने आरोप लगाया है कि मनोज वर्मा ने बड़ी संख्या में लोगों को नौकरी का झांसा दिया। उनके अनुसार आरोपी खुद को CID का DSP बताकर लोगों पर प्रभाव डालता था और सरकारी संस्थानों में नौकरी दिलाने की बात करता था।

अधिवक्ता ने दावा किया कि कैंसर पीड़ित सोनम भारती से भी मोटी रकम ली गई। उन्होंने पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों से मामले में सख्त कार्रवाई और आरोपी की जल्द गिरफ्तारी की मांग की है।

जांच का दायरा बढ़ने की संभावना

फिलहाल पुलिस की प्राथमिकता आरोपी को गिरफ्तार करना है। इसके बाद पूछताछ में यह स्पष्ट हो सकता है कि नौकरी दिलाने के नाम पर कितने लोगों से संपर्क किया गया और इस पूरे मामले में कोई अन्य व्यक्ति भी शामिल था या नहीं।

पुलिस के सामने एक बड़ा सवाल यह भी है कि अगर आरोपी लंबे समय से खुद को CID अधिकारी बताकर लोगों से संपर्क करता था, तो उसने यह पहचान किस तरह स्थापित की और क्या उसने इसके लिए किसी सरकारी दस्तावेज, पहचान पत्र या अन्य माध्यम का इस्तेमाल किया।

भागलपुर पुलिस की ओर से अब तक सामने आई जानकारी के अनुसार आरोपी फरार है और उसकी तलाश जारी है। इस मामले में आगे की कार्रवाई गिरफ्तारी और जांच के बाद और स्पष्ट होगी।

सरकारी नौकरी की चाह रखने वाले लोगों के लिए यह मामला एक बार फिर चेतावनी भी है कि किसी अधिकारी, पुलिसकर्मी या प्रभावशाली व्यक्ति के नाम पर नौकरी दिलाने का दावा करने वाले व्यक्ति को बिना आधिकारिक सत्यापन के कोई रकम नहीं देनी चाहिए। सरकारी भर्ती निर्धारित प्रक्रिया से होती है और किसी व्यक्ति की कथित पहुंच के आधार पर नौकरी मिलने का दावा संदेह का कारण हो सकता है।

भागलपुर पुलिस की आधिकारिक जानकारी में प्रमोद कुमार यादव को वरीय पुलिस अधीक्षक के रूप में दर्ज किया गया है।

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नौकरी के नाम पर ठगी रोकने के लिए सत्यापन जरूरी

सरकारी नौकरी के नाम पर ठगी का यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति के आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे पर भी सवाल खड़ा करता है जिसका फायदा उठाकर ठग बेरोजगार युवाओं और जरूरतमंद परिवारों को निशाना बनाते हैं। पुलिस या किसी सरकारी पद का नाम सुनते ही लोग कई बार बिना दस्तावेजों की जांच किए पैसे दे देते हैं।

ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है कि नौकरी दिलाने का दावा करने वाले व्यक्ति की पहचान और उसके पद का स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जाए। किसी भी सरकारी भर्ती में निर्धारित प्रक्रिया, आधिकारिक विज्ञापन और चयन परीक्षा को प्राथमिक आधार माना जाना चाहिए। भागलपुर के मामले में भी अब जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा यही होगा कि कथित पहचान का इस्तेमाल किस स्तर तक किया गया और कितने लोग इस दावे के कारण आर्थिक नुकसान का शिकार हुए।

पुलिस की कार्रवाई और जांच से अगर पूरे मामले की रकम, पीड़ितों की संख्या और संभावित सहयोगियों की जानकारी सामने आती है, तो इससे ऐसे मामलों पर अंकुश लगाने में मदद मिल सकती है। खासकर सरकारी नौकरी के नाम पर पैसे लेने वालों के खिलाफ तेज और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है, ताकि बेरोजगार युवाओं की मजबूरी किसी के लिए कमाई का जरिया न बन सके।

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